मंगलवार, 6 मार्च 2012

ना जाने...

ना जाने क्या होगा अंजाम
फिर से उभर रही इन हसरतों का
एक अजब सी कसमकस की
जद में हूँ मैं इन दिनों

कैसे रंग दिखाती है
ये रंगीली
कभी हम होश में न थे
और अभी वो वक़्त न रहा

जब हवाएं चली तो
नादाँ बन बैठे
उभर के सामना हुआ तो
मंज़र ही कुछ और था

इक चहरे पे ये नज़रें
टिकी न कभी
आज ठहरी भी कहीं तो
वो चेहरा, चेहरा ना रहा

     
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10 प्रतिक्रियाएँ:

  1. ....बहुत ही बेहतरीन पंक्तियाँ

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  2. कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया

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  3. कुमार भाई
    मेरे यहाँ आने के लिए शुक्रिया, मैं भी आपका फोलोवर बन गया हूँ सो अब आना जाना होता रहेगा!
    आपकी रचना बहुत ही गहरी है और काफी कुछ बयान करती है!
    आप नए लगते हैं ब्लॉग जगत में, स्वागत है आपका!

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  4. बहुत सुंदर और भावमयी अभिव्यक्ति...
    (वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें तो कमेन्ट देने में सुविधा रहेगी)

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    1. शुक्रिया शर्मा जी ... आपके सुझाओं का आगे भी इंतज़ार रहेगा...

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  5. बहुत ही कोमल भावनाओं में रची-बसी खूबसूरत रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई।
    पहली बार आपको पढ़ा बहुत अच्छा लगा

    संजय भास्कर
    sanjaybhaskar.blogspot.com

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