रविवार, 25 मार्च 2012

इक चेहरे के पीछे

इक चेहरे के पीछे, कई चेहरे हैं यारों,
कब तक कोई बोले, अपना नकाब तो उतारो

मुखौटों के बाजार में अपनी सूरत भुला बैठे
हकीकत तो मैं ही हूँ , दावा करतें हैं हजारों

कोई  रंग दिखे मदहोश हो जाते हैं
आके मुझमे ही समा जाओ ए जमाने की बहारों

क्यों कोई खुद ही को, खुद से छुपता है 'सागर'
इक  हुनर तो खुद में बसा लो फिर कद्रदान हैं हजारों

           
                                          -कुमार 'सागर'


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16 प्रतिक्रियाएँ:

  1. उत्तर
    1. यशवंत सर बस आप ही की दुआ है

      आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

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  2. Eloquent and very cutting, incisive and forceful - The message is brilliant and the style so free. Absolutely amazing!

    aur Nida Fazli sahab ne bhi kuchh soch kar hi kaha hoga :
    "Har aadmi me hote hain dus-bees aadmi
    Jab bhi kisi ko dekhna kai bar dekhna"

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  3. बहुत बढ़िया गज़ल सागर जी....

    दाद कबूल करें.

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  4. वाह!!!!!बहुत सुंदर लिखा हें आपने

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  5. बहुत ही बेहतरीन रचना....
    बहुत ही सुन्दर.....

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